शिक्षा की ओर एक कदम – मेरी अनुभव यात्रा
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शिक्षा की ओर एक कदम – मेरी अनुभव यात्रा

पिछले सप्ताह मैंने एक ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त किया, जो मेरे दिल को छू गया। यह था – शिक्षा जागरूकता कार्यक्रम, जिसे श्री आज़ाद सिंह मेमोरियल फाउंडेशन ने आयोजित किया था।

एक स्वयंसेविका के रूप में मैं पहले भी कई अभियानों में भाग ले चुकी हूँ, लेकिन यह दिन मेरे लिए विशेष था। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक नई सोच का बीज था जो हमने एक गाँव में बोया।


जागरूकता से शुरुआत

इस कार्यक्रम का उद्देश्य था – बच्चों, विशेषकर बेटियों की शिक्षा के महत्व को समझाना, और उनके माता-पिता को यह विश्वास दिलाना कि पढ़ाई से उनका कल बेहतर हो सकता है।

कार्यक्रम की शुरुआत गाँव के एक खुले मैदान में हुई, जहाँ नीले आसमान के नीचे एक साधारण सा तम्बू लगा था। वहाँ धीरे-धीरे गाँव के बच्चे, माताएँ, और बुज़ुर्ग इकट्ठा होने लगे। सबके चेहरे पर उत्सुकता और उम्मीद साफ़ दिख रही थी।


सिर्फ बातें नहीं, संवाद हुआ

फाउंडेशन की टीम ने सबसे पहले शिक्षा के लाभ बताए – कैसे एक पढ़ा-लिखा बच्चा सिर्फ खुद नहीं, बल्कि पूरे परिवार का जीवन बदल सकता है। हमनें सरकार की योजनाओं, छात्रवृत्तियों और मुफ्त शिक्षा की जानकारी भी दी।

सबसे प्रेरणादायक क्षण तब आया, जब गाँव की ही एक लड़की आशा, जो अब कक्षा 10 में पढ़ रही है, ने मंच पर आकर अपनी कहानी सुनाई। उसने कहा –
"अगर मुझे पढ़ने का मौका नहीं मिलता, तो शायद मेरी भी कम उम्र में शादी हो जाती। अब मैं खुद के लिए सोच सकती हूँ। मेरे पास सपना है – और उसे पूरा करने का रास्ता भी।"


बातें नहीं, काम भी हुआ

हमनें बच्चों को शिक्षण सामग्री दी, माताओं को जानकारी दी कि घर पर कैसे बच्चों को पढ़ाई में सहयोग करें। बच्चों के लिए हमने एक छोटी सी ड्राइंग प्रतियोगिता रखी – विषय था "मेरा सपना स्कूल"।
बच्चों की कल्पनाएँ देखकर लगा कि वे क्या चाहते हैं – किताबें, अच्छे शिक्षक, और खेलने का समय।

कुछ स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर उन परिवारों से बात की जो कार्यक्रम में नहीं आ सके थे – ताकि कोई पीछे न रह जाए।


मेरा अनुभव – एक नई सोच

इस दिन ने मुझे सिखाया कि परिवर्तन की शुरुआत जानकारी से होती है।
कई बार लोगों को बस थोड़ी सी समझ, मार्गदर्शन और एक विश्वास की ज़रूरत होती है – कि उनका बच्चा पढ़ सकता है, आगे बढ़ सकता है।

शाम को जब मैं घर लौट रही थी, तो थकावट नहीं, बल्कि संतोष था – क्योंकि हमने उस दिन कुछ दीप जलाए थे, जो आने वाले कल को रोशन करेंगे।


आप भी जुड़िए

अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई, तो मैं आपसे निवेदन करती हूँ –
हमारे अगले कार्यक्रम में सहभागी बनिए।
चाहे स्वयंसेवक बनें, आर्थिक सहयोग करें या बस इस संदेश को आगे पहुँचाएँ – हर कोशिश मायने रखती है।

एक पढ़ता बच्चा, एक बदलता भारत।

नेहा, स्वयंसेविका, श्री आज़ाद सिंह मेमोरियल फाउंडेशन

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